मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

शेर पर सवार होकर हरदी आती है माँ महामाया







- मणिकांत साहू, शिक्षक, ग्राम
हरदी
सप्तमी की देर रात हरदी के लोग जब भजन-कीर्तन में डूबे रहते हैं, उसी वक्त मॉ महामाया शेर पर सवार होकर साक्षात् रूप में मं दिर के गर्भगृह में हुंचती है। शेर पर सवार माता के साक्षा त् रूप को भले ही आज तक किसी क्त ने नहीं देखा है, लेकिन दोनों पक्ष की नवरात्रि में सप्तमीं की रात मंदिर के भीतर शेर के पंजों के निशान भक्तों को दिखते हैं।
जिला
मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर ग्राम हरदी की पहाड़ी पर माता महामाया का मंदिर है यहां वर्ष के दोनों नवरात्रि पर्व पर धूम रहती है। नवरात्रि के हले दिन से ही यहां माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों के भक्त यहां ज्योतिकलश प्रज्जवलित कराते हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि रतनपुर के महामाया का एक रूप ग्राम हरदी में विराजित है, जहां मनोकामना लेकर पहुंचने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। साथ ही शारीरिक कष्ट से पीड़ि लोगों का दुख भी माता हरती है। भगवती महामाया के संबंध में लोककथा प्रसिद्ध है कि आज से लगभग 400 वर् पूर्व छत्तीसगढ़ अंचल की राजधानी रतनपुर हुआ करता था, जो 24 परगनों में बंटा था। रतनपुर राज्य के एक परगना के दीवान श्री मलसाय जी थे, जो सरकारी तौर पर उस परगना के सीमावर्ती ग्राम हरदी के लिए नियुक्त थे। वे इसी क्षेत्र में ही निवास करते थे। उस समय रतनपुर के राजा दशहरा त्योहार पर प्रतिवर्ष पशु बलि चढ़ाकर महामाया का पूजन करते थे, जिसे उनके दीवान द्वारा संपन्न कराया जाता था।
एक
बार बलि पूजन का कार्य राजा द्वारा दीवान मलसाय को सौंपा गया। वे महामाया के अन्यय भक्त एवं अहिंसा के पुजारी थे। अतः पशु बलि पाप के भय से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा, और वे चिंतित रहने लगे कि राजा के आज्ञा का पाल कैसे होगा? क्या वे पशु बलि देकर बलि पूजा संपन्न कराएंगे? एक रात मां महामाया ने दीवान मलसाय जी को स्वप्न देकर कहा कि यदि मुझ पर तुम्हें विश्वास है तो, चिंता की कोई जरूरत नहीं है, सब ठीक हो जाएगा। पूजा के दिन तुम्हें जो उचित लगे वही करना, इतने में दीवान जी की नींद खुल गई। चूँकि अहिंसा के पुजारी होने की वजह से मलसाय जी, दीवान बनने के पहले दिन से ही लकड़ी का तलवार रखते थे। पर् की बलि पूजन के अवसर पर दीवान जी ने लकड़ी के उक्त तलवार से यह सोंचकर वार किया कि राजा के आज्ञा का पालन हो जाएगा और पशु की जान भी बच जाएगी। उस दौरान उपस्थित जनसमूह ने मलसाय जी के हाथ को लकड़ी के तलवार सहित ऊपर उठते देखा, लेकिन पशु के गर्दन पर वार करते और गर्दन कटने किसी ने नहीं देखा।
बलि
पूजन के बाद पशु का सिर धड़ से अलग देवी मां के चरणों में पड़ा हुआ देखकर मलसाय चकित हो गए और उन्होंने माता से आर्शीवाद मांगा कि हे मां मैं आपके चरण स्थली रतनपुर से दूर ग्राम हरदी में निवास करता हूं। अतः मुझे प्रतिदिन आपके दर्शन हो, ऐसा आर्शीवाद प्रदान कीजिए। उसी रात मलसाय जी को मां महामाया ने स्वप्न में कहा कि वत्स कल सुबह काल में मेरे मंदिर के द्वार पर तुम्हे शिलाखंड प्राप्त होगा, जिसे तुम मेरी मूर्ति मानकर ग्राम हरदी में स्थापित कर लेना। मूर्ति स्थापना के बाद से तुम्हें और सभी श्रद्धालुओं को मेरे दर्शन का पूर्ण लाभ सदैव मिलता रहेगा। माता जी की आज्ञा के अनुसार मलसाय जी ने दूसरे दिन प्रातः महामाया के द्वार पर प्राप्त शिलाखंडों को लाकर ग्राम हरदी के पहाड़ी पर नीम वृक्ष के नीचे विधिवत् पूजा अर्चना कर स्थापित कर दिया। इसके बाद से मां महामाया की स्थापना ग्राम हरदी में हुई, जो आज ग्राम के अधिष्ठात्री देवी के रूप में भक्तों के कृतार्थ कर रही हैं।
ग्रामीणों
के अनुसार पिछले कई दशकों से सप्तमी की देर रात लोग जब मंदिर के बाहर भजन-कीर्तन में डूबे रहते हैं, उसी वक्त मॉ महामाया शेर पर सवार होकर साक्षात् रूप में मंदिर के गर्भगृह में पहुंचती है। सप्तमी पर मंदिर में पूजा का सिलसिला रात 11 बजे तक जारी रहता है, इसके बाद कुछ सम के लिए ट्रस्ट द्वारा मंदिर के सभी पट बंद कर दिए जाते हैं। रात 12 बजे के बाद जब मंदिर का पट खोला जाता है, तो माता की प्रतिमा के सामने फर्श पर शेर के पंजे के निशान दिखते हैं। जिसकी एक झलक पाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ टूट पड़ती है। गाँव के बुजुर्ग बताते है कि सप्तमी की रात 11 बजे माता की मूर्ति के सामने आटा बिछा दिया जाता है। इसके बाद मंदिर के पट कुछ समय के लिए बंद कर सभी बाहर निकल जाते हैं। वहां बैगा भी नहीं रहता। इस दौरान सभी लोग मंदिर के बाहर भजन-कीर्तन करते हुए माता की भक्ति में लीन रहते हैं। तभी माता साक्षात् रूप में शेर पर सवार होकर मंदिर के गर्भगृह में पहुंचती है और वे कुछ देर विश्राम कर भोग भी ग्रहण करती है। कुछ देर बाद जब मंदिर का पट खोला जाता है, तो माता की मूर्ति के सामने फर्श पर बिछे आटे में शेर के पंजे के निशान जगह-जगह दिखते हैं।
मंदिर
के ही पुजारी जगन्नाथ पाण्डेय तथा जितेन्द्र पाण्डेय ने बताया कि शेर कहां से आता है, इसकी जानकारी आज तक किसी को नहीं हुई है। जिस वक्त माता शेर पर सवार होकर मंदिर के गर्भगृह में पहुंचती है, उस समय सभी दरवाजे बंद रहते है। ऐसे में मंदिर के अंदर किसी व्यक्ति के पहुंचने का कोई रास्ता भी नहीं रहता। वे बताते है कि सप्तमीं की रात होने वाला यह चमत्कार कब से हो रहा है, तथा इसके पीछे देवी की क्या मंशा है, इस बारे में भी स्पष्ट कर पाना संभव नहीं है, लेकिन सच्चाई यह है कि मंदिर में शेर के पदचिन्ह बनने का सिलसिला पिछले कई दशकों से जारी है। महामाया मंदिर परिसर में भोले भंडारी, मां दुर्गा, राम-जानकी, साईबाबा सहित अन्य देवी देवता स्थापित है, जो अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। वर्तमान में ग्रामवासियों द्वारा गठित श्री महामाया शक्ति पीठ सेवा समिति हरदी के अनुकरणीय प्रयास से यह मंदिर उत्तरोतर प्रगति एवं नव निर्माण की ओर अग्रसर है।

"सुधा धार झरती रहे, महामाया के द्वार
दीन-दुखी अद्य आलसी, सबके हो उद्धार"

1 टिप्पणियाँ (+add yours?)

rajeev ने कहा…

Its a symbol for the faith against existence of the supreme authority even in our local surrounding.

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